अंध श्रद्धा भक्ति कैसे प्रारम्भ हुई ?
सुदामा जी पंडित थे सुदामा जी ब्राह्मण कुल में जन्मेथे। निर्धनता चरम पर थी। कई बार बच्चे भी भूखे सो जाते थे। सुदामा जी की धर्मपत्नी को पता था कि द्वारिका के राजा श्री कृष्ण जी के साथ सुदामा जी की अच्छी मित्रता है। पत्नी ने बहुत बार कहा कि आप अपने राजा मित्र कृष्ण से कुछ धन माँग लाओ। सुदामा जी कहते थे कि पंडित का काम माँगना नहीं होता है। परमात्मा के विधान को समझकर उसके अनुकूल जीवन यापन करना होता है। गरीबदास जी ने भी कहा है कि: - गरीब, नट,पेरणा कांजर सांसी, मांगत हैं भठियारे । जिनकी भक्ति में लौ लागी, वो मोती देत उधारे ।। गरीब, जो मांगै सो भडूवा कहिए, दर-दर फिरै अज्ञानी । जोगी जोग सम्पूर्ण जाका,मांग ना पीवै पानी ।। परंतु पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर विप्र सुदामा जी अपने मित्र श्री कृष्ण जी के पास चले गए । श्री कृष्ण जी ने उनका विशेष सत्कार किया मुठ् ठीभर चावल साथ लेकर गए थे जो श्री कृष्ण जी ने चाव के साथ खाए । चरण तक धोये और कुशल-मंगल पूछा तो पंडित सुदामा जी ने कहा कि हे भगवान ! मुझे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है । आपकी कृपा से ठीक निर्वाह हो र...