जीव हिंसा महापाप
जीव हिंसा महापाप है।
गला काटै कलमा भरै, किया करै हलाल।
साहिब लेखा मांगसी तब होगा कौन हवाल।।
कबीर, दिनको रोजा रहत हैं, रात हनत हैं गाय।
यह खून वह वंदगी, कहुं क्यों खुशी खुदाय।।
पूर्ण परमात्मा का आदेश नहीं है माँस खाने का ।।
परमात्मा
ने इंसान तो क्या जानवरों को भी मांस खाने की इजाजत नहीं दी।
सबके खाने के लिए फल, सब्जियां, अनाज, और पेड़ पौधे बनाये हैं।
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